Tuesday, April 6, 2010

SHANI DEV VRAT KATHA

शनिवार व्रत की विधि:---इस दिन शनि की पूजा होती है काला तिल,काला वस्त्र,तेल,उड़त शनि देव को बहुत प्रिये है इसलिय उनके द्वारा शनिदेव की पूजा होती है शनि की दशा को दूर करने के लिए यह व्रत किया जाता है शनि स्त्रोत का पाठ भी विशेष लाभदायक सिद्ध होता है ॥

शनिवार व्रत कथा:---एक समय सूर्य,चन्द्रमा,मंगल, बुध,ब्रहस्पति,शुक्र,शनि,राहू और केतु इन ग्रहों का आपस में झगरा हो गया की हम सबमे सबसे बड़ा कौन है सब अपने आप को बड़ा कहते थे जब आपस में कोई निश्चे ना हो सका तो सब के सब झगड़ते हुए इन्द्र के पास गए और कहने लगे की आप सब देवताओं के राजा हो इसलिए आप हमारा न्याय करके बताओ की हम ग्रहों में सबसे बड़ा कौन हैइन्द्र इनका प्रशन सुनकर घबरा गए और कहने लगे के मुझमे यह सामर्थ नहीं है जो किसी को बड़ा या छोटा बतलाऊ मैं अपने मुख से कुछ नहीं कह सकता हु हां एक उपाए हो सकता है इस समय प्रथ्वी पर राजा विक्रमादित्य दुसरो के दुखो का निवारण करने वाला है इसलिए तुम सब मिलकर उन्ही के पास जाओ वही तुम्हारे दुखो का निवारण करेंगे॥

ऐसा वचन सुनकर सभी गृह देवता चालकर भूलोक में राजा विक्रमादित्य की सभा में जाकर उपस्थित हुए और अपना प्रशन राजा के सामने रखा राजा उनकी बात सुनकर बड़ी चिंता में पड़ गए की मैं अपने मुख से किसको बड़ा और किसको छोटा बतलाऊ। जिसको छोटा बतलाऊंगा वही क्रोध करेगा,परन्तु उनका झागडा निपटाने के लिए एक उपाए सोचा की सोना,चांदी,कांसा,पीतल,शीशा,रांगा,जस्ता,अभ्रक और लोहा नवो ग्रहों के नौ आसन बनवाये । अब आसनों को क्रम से जैसे सोना सबसे पहले और लोहा सबसे पीछे बिछाए गए। इसके पश्चात रजा ने सबको कहा की आप सब अपने अपने सिंघासन पर बैठीये जिसका आसन सबसे आगे वो सबसे बड़े और जिसका आसन सबसे पीछे वि सबसे छोटा जानिये क्योंकि लोहा सबसे पीछे था और वह शनिदेव का आसन था इसलिए शनिदेव ने समझ लिया के राजा ने मुझे सबसे छोटा बना दिया है

इस पर शनि को बड़ा क्रोध आया और कहा के रजा तू मेरे पराक्रम को नहीं जानता । सूर्य एक राशि पर एक महीना चन्द्रमा सवा दो महिना दो दिन मंगल डेढ़ महीना ब्रहस्पति तेरह महीने बुध और शुक्र एक महीने परन्तु मैं एक राशि पर ढाई अथवा सादे सात साल तक रहता हु बड़े बड़े देवताओं को भी मैंने भीषण दुःख दिया है । राजन सुनो राम जी को सादे साती आई और बनवास हो गया रावण पर आई तो राम ने लक्ष्मण के साथ सेना लेकर लंका पर चडाई कर दी। रावन के कुल का नाश कर दिया । हे राजा अब तुम सावधान रहना । राजा कहने लगा जो कुछ भाग्य में होगा देखा जाएगा । उसके बाद अन्य ग्रेह तो प्रसन्नता के साथ चले गए परन्तु शनि देव बड़े क्रोध के साथ वहासे सिधारे॥

कुछ काल व्यतीत हो जाने पर जब राजा को साढ़े साती की दशा आई तो शनिदेव घोड़ो के सौदागर मोहि लार्क हबर के साथ राजा की राजधानी आये । जब राजा ने सौदागर के आने की खबर सुनी तो अश्वपाल को अच्छे अच्छे घोड़े खरीदने की आगया दी। अश्वपाल ऐसी अच्छी नसल के घोड़े देखकर और उनका मूल्य सुनकर चकित हो गया और तुरंत ही राजा को खबर दी। रजा उन घोड़ो को देखकर एक अच्छा घोडा चुनकर सवारी के लिए चदा। राजा के घोड़े पर चदते ही घोडा जोर से भागा। घोडा बड़ी दूर एक बड़े जंगल में जाकर राजा को छोड़कर अंतर्ध्यान हो गया। इसके बाद राजा अकेला जंगल में अकेला फिरता रहा। बहुत देर के पश्चात राजा ने भूख और प्यास से दुखी होकर भटकते भटकते एक गवाले को देखा। गवाले ने राजा को प्यास से व्याकुल देखकर पानी पिलाया। राजा की ऊँगली में एक अंगूठी थी वे उसे निकाल कर प्रसन्नता के साथ ग्वाले को दे दी और शहर की और चल दिया राजा शहर में पहुंच कर एक सेठ की दूकान पर जाकर बित गया और अपने आप को उज्जैन का रहने वाला और अपना नाम विका बताया। सेठ ने उसको कुलीन मनुष्य समझ कर जल आदि पिलाया। भाग्यवश उसदिन सेठ की दूकान पर बिक्री बहुत अधिक हुई सेठ उसको भाग्यवान पुरुष समझकर भोजन कराने के लिए अपने साथ ले गया। भोजन कराते समय राजा ने आश्चर्य की बात देखी की एक खूंटी पर हार लटक रहा है और वेह खूंटी उस हार को निगल रही है। भोजन के पश्चात कमरे में आने पर जब सेठ को कमरे में हार न मिला तो सबने येही निश्चे किया की सिवाए विका के और कोइ इस कमरे में नहीं आया। आवश्य ही उसी ने हार चोरी किया है परन्तु विका ने हार लेने से मन कर दिया .इस पर पांच सात आदमी इकठे होकर फौजदार के पास ले गए फौजदार ने उसको राजा के सामने उपस्थित कर दिया और कहा की यह आदमी तो भला प्रतीत होता है चोर मालुम नहीं होता परन्तु सेठ का कहना है इसके सिवाए और कोई घर में आया ही नहीं आवश्य ही चोरी इसी ने की है तब राजा ने आगया दी इसके हाथ पैर काट दिए जाए। राजा की आगया सुनकर विक्रमादित्य के हाथ पैर काट दिए गए इस प्रकार कुछ काल व्यतीत होने पर एक तेली उसको अपने घर ले गया और कोहलू पर बिठा दिया। राजा उसपर बैठ कर जुबां से बैल हांकता रहा जब शनि की दशा समाप्त हो गयी और एक रात को वर्षा ऋतू के समय वेह मल्हार राग गाने लगा। उसका गाना सुनकर उस शहर के राजा की कन्या उस राग पर मोहित हो गयी और दासी को खबर लाने को भेजा की शहर में कौन गा रहा है। दासी सारे शहर में फिरती फिरती क्या देखती है की तेली के घर एक चौरंगिया गाना गा रहा है । दासी ने महेल में जाकर राजकुमारी को सब वृत्तांत सुनाया बस राजकुमारी ने उसी क्षण अपने मन में यह प्राण कर लिया चाहे कुछ भी हो जाए मैंने इस चौरंगिये से विवाह करना है प्रातकाल होते ही जब दासी ने राजकुमारी को जब जगाना चाहा तो राजकुमारी अनशन व्रत लेकर पड़ी रही। तब दासी ने राजकुमारी के न उठने का कारण बताया। रानी ने तुरंत ही राजकुमारी को जगाया और उसका कारण पूछा तोह रानी ने कहा की माता जी मैंने यह प्राण लिया है की तेली के घर में जो चौरंगिया है मैं उसी से विवाह करुँगी तब माता ने कहा पगली यह क्या बात कर रही है तुझको किसी देश के राजा के साथ बहाया जाएगा । कन्या कहने लगी माता जी मैं अपना प्राण कभी नहीं तोदुंगी.माता ने चिंतित होकर यह बात राजा को बतायी तब राजा ने भी समझाया मैं अभी देश दशांतर अपने दूत भेजकर सुयोग्य रूपवान गुनी राजकुमार के साथ तेरा विवाह करूँगा ऐसी बात तुमको कभी नहीं विचारनी चाहिए । कन्या ने कहा पिताजी मैं अपने प्राण त्याग दूंगी परन्तु किसी दुसरे से विवाह नहीं करुँगी। इतना सुनकर राजा ने क्रोध में कहा की यदि तेरे भाग्य में यही लिखा है तो वैसा ही कर। राजा ने तेली को बुलाकर कहा की तेरे घर में जो चौरंगिया है उसके साथ मैं अपने पुत्री का विवाह करना चाहता हु। तेली ने कहा की यह कैसे हो सकता है.कहा आप राजा और कहा मैं नीच तेली। परन्तु राजा ने कहा की भाग्य मैं लिखे को कोई नहीं ताल सकता अपने घर जाकर विवाह की तयारी करो.राजा ने उसी समय तौरण और वन्दनवार लगवाकर अपनी राजकुमारी का विवाह चौरंगिया विक्रमादित्य के साथ करवा दिया। रात्री को जब विक्रमादित्य और राजकुमारी महल में सोये थे तो आधी रात के समय शनिदेव ने विक्रमादित्य को स्वपन दिया और राजा से कहा-राजा कहो मुझको छोटा बतलाकर तुमने कितना दुःख उठाया। राजा ने शमा मांगी। शनिदेव ने प्रसन्न होकर विक्रम को हाथ पैर दिए। तब राजा ने कहा-महाराज मेरिप्रथाना स्वीकार करे की जैसा दुःख आपने मुझे दिया है ऐसा किसी और को न दे। शनिदेव ने काहा की तुम्हारी प्राथना स्वीकार हैजो मनुष्य मेरी कथा सुनेगा या कहेगा उसको मेरी दशा में किसी प्रकार का दुःख नहीं होगा और जो नित्य मेरा ध्यान करेगा या चींटियो को आत्ता डालेगा उसके सब मनोरथ पूरण होंगे। इतना कह्कर्शनिदेव अपने धाम को चले गए। राजकुमारी की आँख खुली और उसने राजा के हाथ पाओ देखे तो आश्चर्य को प्राप्त हुई। उसको देखकर राजा ने अपना समस्त हाल कहा की मैं उज्जैन का राजा विक्रमादित्य हु। यह बात सुनकर राजकुमारी अत्यंत प्रसन्न हुई । प्रात काल राजकुमारी से उसकी सखियों ने पुछा तो उसने अपने पति का समस्त वृत्तांत कह सुनाया। तब सब ने प्रसन्नता प्रकट की और कहा की इश्वर ने आपकी मनोकामना पूरण कर दी। जब उस सेठ ने यह बात सुनी तो वेह विक्रमादित्य के पास गया और उसके पैरों में गिरकर क्षमा मांगने लगा की आप पर मैंने चूरी का झूठा दोष लगाया। आप मुझको जो चाहे दंड दे। राजा ने कहा-मुझपर शनिदेव का कोप था- इस कारण यह सब दुःख मुझको प्राप्त हुआ। इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं, तुम अपने घर जाकर अपना कार्य करो।सेठ बोला की मुझे तभी शान्ति मिलेगी जब आप मेरे घर चलकर भोजन करेंगे.राजा ने कहा जैसी आपकी मर्ज़ी वैसा ही करे। सेठ ने अपने घर जाकर अनेक प्रकार के सुन्दर भोजन बनवाये और राजा विक्रमादित्य और प्रतिभोज दिया। जिस समय राजा भोजन कर रहे थे एक अत्यंत आश्चर्य की बात सबको दिखाई दी की जो खूँटी पहले हार निगल गयी थी वो अब हार उगल रही थी जब भोजन समाप्त हो गया तो सेठ ने बहुत सी मोहरे राजा को भेंट की। और कहा की मेरी श्रीकव्री नामक एक कन्या है आप कृपया उसके साथ अपना विव्ह स्वीकार करे राजा के हां कहने पर सेठ ने उसके साथ राजा का विवाह कर दिया और साथ में bहुत सा दहेज़ भी दिया वहा पर कुछ दिन व्यतीत करने के बाद कहा राजा ने कहा की मेरी उज्जैन जाने की इच्छा है फिर कुछ दिन के बाद विदा लेकर राजकुमारी मनभावनी,सेठ की कन्या श्रीकवारी तथा दोनों जगहों से दहेज़ में प्राप्त अनेक दास,दासी,रथ और पालकियों सहित विक्रमादित्य उज्जैन की तरफ चल्र। जब शहर के निकट पहुंचे और पुरवासियो ने राजा के आने का संवाद सुना तो समस्त उज्जैन की प्रजा अगवानी के लिए आई। तब बड़ी प्रसन्नता से राजा अपने महल में पधारे। सारे शहर में भारी महोत्सव मनाया गया। रात्री को दीपमाला की गयी। दुसरे दिन राजा ने शेहेर में यह सूचना कराई की शनिदेव सब ग्रहों में सर्वोपर है। मैंने इनको छोटा बतलाया इसी से मुझको यह दुःख प्राप्त हुआ। इस कारण सारे शहर में शनिदेव की पूजा और कथा होने लगी। राजा और प्रजा अनेक प्रकार के सुख भोगती रही। जो कोई भी शनिदेव की इस कथा को सुनता या पड़ता है शनिदेव की कृपा से उसके सब दुःख दूर हो जाते है शनिवार की कथा को व्रत के दिन आवश्य पड़ना चाहिए।